प्रधानाध्यापक जान मोहम्मद प्रकरण में फैलाई जा रहीं भ्रामक खबरें*

*प्रधानाध्यापक जान मोहम्मद प्रकरण में फैलाई जा रहीं भ्रामक खबरें*
मथुरा/देवेन्द्र शर्मा। शिक्षक की शिकायत जांच में झूठी पाई गई है। कहा जा सकता है कि – “शिकायत पर संज्ञान लेना एक अधिकारी का कर्तव्य है, और निष्पक्ष जाँच के उपरांत न्यायोचित बहाली करना अधिकारी की प्रशासनिक कुशलता।”
बेसिक शिक्षा अधिकारी द्वारा लिए गए सभी निर्णय नियमों, साक्ष्यों और जाँच रिपोर्ट की शुचिता पर आधारित रहे हैं। इसमें किसी भी प्रकार के दबाव या पक्षपात का कोई स्थान नहीं है।
मथुरा जैसे चुनौतीपूर्ण जनपद में, जहाँ शिक्षा प्रशासन को साहस, संतुलन और संवेदनशीलता के त्रिकोण पर चलना पड़ता है, वहाँ बेसिक शिक्षा अधिकारी रतन कीर्ति ने एक पारदर्शी कार्यप्रणाली स्थापित कर मिसाल पेश की है।
लेकिन मामले का विश्वास पूर्ण पटाक्षेप हो जाने के बाद भी कुछ भ्रामक और काट-छाँट कर दिखाई जा रही क्लिप्स न केवल तथ्यों को तोड़ती हैं, बल्कि एक कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी का मानसिक उत्पीड़न भी करती हैं।
पूर्ववर्ती बीएसए द्वारा छोड़ी गईं पेंडेंसी का निस्तारण, बाल्य देखभाल अवकाश में पारदर्शिता और नगरीय सीमा विस्तार जैसे जटिल कार्यों को बीएसए रतन कीर्ति ने जिस सुगमता से पूर्ण किया है, वह उनकी कार्यक्षमता का प्रमाण है।
लेकिन संज्ञान में आया है कुछ लोग विभाग के भी नहीं हैं और उन्हें विभागीय कार्यप्रणाली के बारे में पूर्ण जानकारी भी नहीं है वो आज जब एक ईमानदार नेतृत्व को घेरने का प्रयास कर रहे हैं। तब सत्य और न्याय के पक्ष में खड़ा होना हम सबका नैतिक दायित्व है।
क्योंकि जान मुहम्मद का सम्मान सभी शिक्षकों का सम्मान है और इस सम्मान को प्रदान करने में बीएसए रतन कीर्ति द्वारा कोई कोताही नहीं बरती है।
*हम मैडम के संकल्प और उनकी ईमानदारी के साथ हैं- शिक्षक संगठन*
“कर्तव्य का पालन और न्याय का साथ—बेसिक शिक्षा अधिकारी की कार्यशैली का यही आधार रहा है। मथुरा जनपद में शिक्षा व्यवस्था को पारदर्शी बनाने के लिए उन्होंने नियमों और तथ्यों को सर्वोपरि रखा, न कि किसी बाहरी दबाव को।”
अतः “सत्य को परेशान किया जा सकता है, पराजित नहीं। एक निष्पक्ष प्रशासनिक व्यवस्था के सम्मान में, हम सब एकजुट होकर बीएसए के साथ खड़े हैं।”
